(Farming is a Labor of Love) आज जब आधुनिक कृषि में मशीनों पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है और युवा पीढ़ी खेती-किसानी से दूरी बनाते जा रहे हैं, ऐसे दौर में रायपुर जिले के अभनपुर अंतर्गत ग्राम जौन्दी के 80 वर्षीय किसान रामानंद साहू अपने श्रम, जज्बे और आत्मनिर्भरता से खेती का ऐसा उदाहरण पेश कर रहे हैं, जो पूरे अंचल के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है।
उम्र के इस पड़ाव में भी वे खेत की मेड़ की खपटाई से लेकर धान की बोनी, फसल की देखभाल और खाद प्रबंधन तक अधिकांश कृषि कार्य स्वयं अपने हाथों से करते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण उन्हें ‘‘खेती अपने सेती’’ का जीवंत उदाहरण मानते हैं।
अंतिम चरण में है बुवाई का काम
खरीफ सीजन अपने अंतिम बुवाई चरण में है। क्षेत्र में जुताई के बाद खुर्रा बोनी एवं लह्या बोनी का कार्य लगभग पूरा होने की ओर है। जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है या जिनके खेतों में पर्याप्त जलभराव है, वे अंकुरित धान बीज की लह्या बोनी कर रहे हैं। वहीं थरहा (रोपा) लगाने का कार्य अभी शुरुआती दौर में है और आने वाले दिनों में इसमें तेजी आने की उम्मीद है।
अच्छी बारिश का इंतजार
इधर 4 जुलाई की रात से लगातार 36 घंटे हुई झमाझम बारिश के बाद मानसून की रफ्तार अचानक थम गई है। खेतों में नमी बनाए रखने और रोपा कार्य को गति देने के लिए किसान एक बार फिर अच्छी वर्षा का इंतजार कर रहे हैं। बारिश थमने से उमस और गर्मी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
रामानंद स्वयं करते हैं खेती का काम
(Farming is a Labor of Love) इसी बीच ग्राम जौंदी के खेतों में 80 वर्षीय रामानंद साहू धान की लह्या बोनी करते नजर आए। उन्होंने बताया कि करीब साढ़े चार एकड़ रेगहा भूमि में मेड़ की खपटाई से लेकर अंतिम बुवाई तक का पूरा कार्य उन्होंने स्वयं किया है। अब जहां धान की फसल लगभग पांच इंच की हो चुकी है, वहां खाद डालने की तैयारी भी वे खुद करेंगे। केवल जुताई का कार्य उनके नाती ने अपने ट्रैक्टर से किया है, जबकि उनका इकलौता पुत्र अन्य स्थानों की खेती की देखरेख करता है।

रामानंद साहू कुल 18 एकड़ कृषि भूमि पर खेती करते हैं, जिसमें 4 एकड़ स्वयं की तथा 14 एकड़ रेगहा भूमि शामिल है। खरीफ और रबी दोनों मौसम में वे आधुनिक एवं पारंपरिक कृषि पद्धतियों का समन्वय कर खेती करते हैं। वर्षों की मेहनत और कृषि के प्रति समर्पण का ही परिणाम है कि आज उनके पास स्वयं का ट्रैक्टर और हार्वेस्टर उपलब्ध है।
खेती ही है जिंदगी
(Farming is a Labor of Love) रामानंद साहू का कहना है कि ‘‘जब तक खेत में काम नहीं करता, तब तक न खाना अच्छा लगता है और न ही नींद आती है। खेती ही मेरी जिंदगी है।’’ उनके इस जज्बे ने साबित कर दिया है कि खेती केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि श्रम, अनुशासन और धरती से जुड़े रहने का जीवन दर्शन है।
खेती के प्रति समर्पण ही किसान की सबसे बड़ी पूंजी
आज जब युवा वर्ग खेती से दूरी बना रहा है, ऐसे समय में रामानंद साहू (Farming is a Labor of Love) जैसे कर्मयोगी किसान यह संदेश दे रहे हैं कि मेहनत, आत्मनिर्भरता और खेती के प्रति समर्पण ही किसान की सबसे बड़ी पूंजी है। उनका जीवन संघर्ष, श्रम और कृषि संस्कृति का जीवंत उदाहरण है, जो पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
(Farming is a Labor of Love) रामानंद साहू का यह जज्बा साबित करता है कि खेती केवल पेशा नहीं, बल्कि अनुशासन, श्रम, धैर्य और प्रकृति के प्रति आस्था का नाम है। आज जब कृषि क्षेत्र अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब ऐसे कर्मठ किसान नई पीढ़ी को यह संदेश दे रहे हैं कि मेहनत, लगन और आत्मविश्वास से खेती न केवल सम्मानजनक आजीविका है, बल्कि समृद्धि का मजबूत आधार भी बन सकती है।
गांव के लोगों का कहना है कि रामानंद साहू की दिनचर्या और खेतों के प्रति उनका समर्पण युवाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। अस्सी वर्ष की उम्र में भी उनका उत्साह, कार्यक्षमता और आत्मनिर्भरता यह साबित करती है कि किसान की असली ताकत उसकी मेहनत और मिट्टी से जुड़ाव में ही निहित है।
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