राजिम। ढोल-नगाड़ों की गूंज… पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण… सड़कों के दोनों ओर उमड़ी भीड़… और इसी बीच जब एक-एक कर जहरीले सांप Snake शोभायात्रा का हिस्सा बने तो लोगों की नजरें वहीं थम गईं। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि गरियाबंद जिले के राजिम क्षेत्र के ग्राम देवरी में ऋषि पंचमी के दिन वर्षों से चली आ रही अनोखी परंपरा का हिस्सा है।
यहां नागदेवों की पूजा केवल मंदिर या घर तक सीमित नहीं रहती। ऋषि पंचमी पर सांवरा समाज के लोग विधि-विधान से सर्पों Snake की पूजा करते हैं और इसके बाद उनकी बाकायदा शोभायात्रा निकाली जाती है। मंगलवार को गांव में 9 सर्पों की विशेष शोभायात्रा निकली। ढोल-नगाड़ों की थाप और धार्मिक जयघोष के बीच निकली इस यात्रा को देखने के लिए देवरी ही नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
नागदेवों की शोभायात्रा
ऋषि पंचमी के अवसर पर ग्राम देवरी के अटल चौक से शोभायात्रा की शुरुआत हुई। इसके बाद यात्रा गांव की विभिन्न गलियों से होती हुई शीतला माता प्रांगण पहुंची। ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ सांवरा समाज के लोग और ग्रामीण पारंपरिक तरीके से यात्रा में शामिल हुए। रास्तेभर लोगों ने नागदेवों के दर्शन किए और धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा-अर्चना की। शीतला माता प्रांगण में परंपरा के अनुसार पाठ-पिठौलिया और ठंडा करने की रस्म पूरी की गई। धार्मिक अनुष्ठान के बाद शोभायात्रा की वापसी हुई।
फूलों से हुआ नागदेवों का पूजन
इस आयोजन में सबसे खास दृश्य वह रहा, जब सर्पों Snake की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। स्थानीय पुजारियों और समाज के बुजुर्गों की मौजूदगी में नागदेवों को दूध, हल्दी, कुमकुम और फूल अर्पित किए गए। ग्रामीणों ने नागदेवों से गांव की खुशहाली, फसलों की सुरक्षा और परिवारों की सुख-समृद्धि की कामना की। शोभायात्रा के दौरान जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पूजा कर नागदेवों का स्वागत किया।
आस्था नहीं… सर्पदंश से बचाव का भी संदेश
देवरी की इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि यहां सर्पों Snake को केवल धार्मिक आस्था से नहीं जोड़ा गया है। सर्पदंश से बचाव और प्राथमिक उपचार की जानकारी देने की परंपरा भी इससे जुड़ी हुई है। ग्राम देवरी स्थित गुरु सांवरा पाठशाला को इस परंपरा का प्रमुख केंद्र बताया जाता है। आयोजकों के अनुसार यहां ग्रामीणों और युवाओं को सांपों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने तथा सर्पदंश की स्थिति में प्राथमिक उपचार से जुड़ी जानकारी दी जाती है।
Snake खास तौर पर खेतों और घरों में निकलने वाले सांपों को बिना नुकसान पहुंचाए सुरक्षित तरीके से पकड़कर उनके प्राकृतिक वातावरण में छोड़ने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
ऋषि पंचमी पर होता है प्रशिक्षण का दीक्षांत समारोह
गुरु सांवरा पाठशाला से जुड़ी इस परंपरा में ऋषि पंचमी का दिन विशेष महत्व रखता है। इसी अवसर पर प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों के लिए दीक्षांत समारोह भी आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य सर्पों Snake को लेकर ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ाना और सर्पदंश जैसी आपात स्थिति में प्राथमिक स्तर पर जरूरी जानकारी उपलब्ध कराना बताया जाता है।
पूजा के बाद जंगल में लौट जाते हैं नागदेव
पूरे आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा धार्मिक रस्मों के बाद शुरू होता है। पूजा और शोभायात्रा पूरी होने के बाद सर्पों Snake को सुरक्षित तरीके से उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगल में छोड़ने की परंपरा है। यही वजह है कि देवरी की ऋषि पंचमी की परंपरा केवल धार्मिक आयोजन बनकर नहीं रह जाती, बल्कि यह मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संवेदनशीलता का संदेश भी देती है। ग्रामीणों के मुताबिक वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में सर्पों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पूरा गांव बन जाता है यात्रा का हिस्सा
देवरी की गलियों में जब ढोल-नगाड़े बजते हैं और उनके बीच नागदेवों की शोभायात्रा निकलती है, तो माहौल पूरी तरह धार्मिक और उत्सवी हो जाता है। दूर-दूर से पहुंचे लोग इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए घंटों इंतजार करते हैं। सर्पों को सामने देखकर कई लोगों के चेहरे पर रोमांच दिखाई देता है तो श्रद्धालु इसे नागदेवों के प्रति आस्था से जोड़कर देखते हैं।
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