कर्ज लेकर खेती की, दिन-रात मेहनत की, खाद और कीटनाशकों पर हजारों रुपये खर्च किए, लेकिन जब मेहनत की फसल घर लाने का समय आया तो कुदरत की मार ने किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया। छत्तीसगढ़ में अर्नब चक्रवात के प्रभाव से हुई बेमौसम बारिश ने नवापारा-राजिम क्षेत्र के किसानों की कमर तोड़ दी है।
खेतों में पककर कटाई के लिए तैयार खड़ी धान की फसल कहीं पानी में डूब रही है तो कहीं तेज बारिश और हवा के चलते जमीन पर बिछ गई है। हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी आंखों के सामने महीनों की मेहनत को बर्बाद होते देखने को मजबूर हैं।
कटाई के वक्त खेत बने पानी के तालाब
नवापारा सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में बारिश के बाद खेतों की तस्वीर बदल गई है। जिन खेतों में कुछ दिन पहले सुनहरी धान की बालियां लहलहा रही थीं, वहां अब पानी भरा हुआ है। कई स्थानों पर धान की फसल जमीन पर गिर चुकी है, जबकि निचले खेतों में पानी भरने से धान की बालियां डूबने लगी हैं। किसान पानी के बीच खेतों में उतरकर किसी तरह अपनी फसल बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि इस बार पहले ही भीषण बाढ़ ने खेती को भारी नुकसान पहुंचाया था। किसी तरह बची हुई फसल को संभालने के लिए खाद, कीटनाशक और दवाइयों का छिड़काव कर फसल को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की गई थी। उम्मीद थी कि अब फसल पककर तैयार होगी और मेहनत का फल मिलेगा, लेकिन कटाई के ठीक पहले अर्नब चक्रवात से हुई बारिश ने बची-खुची उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया।
दर्जनों गांवों में फसल बर्बादी का संकट
नवापारा-राजिम क्षेत्र के चंपारण, टीला, डंगनिया, सेमरा, भोथी, तोरला, तामासिवनी, नवागांव, कोलियरी, पारागांव, बुडे़नी, नवागांव भेंडरी, चंदना, चमसुर, खट्टी, परसट्ठी, किरवई, कोमा, बासिन, बोरसी, बकली, रावड़, चौबेबांधा, सिंधौरी और बरोंडा सहित दर्जनों गांवों में खेतों में खड़ी धान की फसल पर संकट मंडरा रहा है। कई गांवों के किसान फसल को लेकर बेहद चिंतित हैं। महीनों की मेहनत और हजारों रुपये की लागत लगाने के बाद अब उन्हें समझ नहीं आ रहा कि खेतों में भरे पानी और गिरी हुई फसल को कैसे बचाया जाए।
भेंडरी में बाहरा नाले का खराब गेट बना मुसीबत, सैकड़ों एकड़ फसल डूबने का दावा
धमतरी जिले मगरलोड ब्लॉक अंतर्गत ग्राम भेंडरी के किसानों ने एक अलग ही समस्या की ओर प्रशासन और सिंचाई विभाग का ध्यान आकर्षित किया है। किसानों के मुताबिक बाहरा नाले के किनारे सैकड़ों एकड़ में लगी धान की फसल पानी में डूबकर बर्बाद होने की स्थिति में पहुंच गई है। ग्रामीणों का कहना है कि बाहरा नाले में पानी के नियंत्रण के लिए चार दरवाजे बनाए गए हैं, लेकिन इनमें से एक दरवाजा करीब दो वर्षों से खराब पड़ा है।
आरोप है कि खराब गेट के कारण नाले का पानी अनियंत्रित तरीके से अधिक मात्रा में बहकर आसपास के खेतों में प्रवेश कर गया। इससे किसानों की खड़ी धान की फसल पानी में डूब गई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते नाले के खराब गेट की मरम्मत करा दी गई होती तो संभवतः इस नुकसान को कम किया जा सकता था।
किसानों ने सिंचाई विभाग और संबंधित जिम्मेदारों से सवाल उठाते हुए कहा कि जब दो वर्षों से गेट खराब होने की जानकारी है तो अब तक उसकी मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? ग्रामीणों ने मांग की है कि बाहरा नाले के खराब गेट को तत्काल सुधारा जाए, ताकि आगे किसानों की फसल को इस तरह के नुकसान से बचाया जा सके।
पटवारियों की हड़ताल ने बढ़ाई किसानों की चिंता, नुकसान का सर्वे कौन करेगा?
प्राकृतिक आपदा से फसल बर्बादी की मार झेल रहे किसानों के सामने अब मुआवजे का संकट भी खड़ा होता दिखाई दे रहा है। एक ओर खेतों में पानी भरा है और फसल खराब हो रही है, वहीं दूसरी ओर पटवारियों की हड़ताल के चलते फसल नुकसान के सर्वे को लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है।
किसानों का कहना है कि शासन से मुआवजा प्राप्त करने के लिए खेतों में हुए नुकसान का सर्वे और उसका आकलन जरूरी है। लेकिन जब पटवारी हड़ताल पर हैं तो खेतों का निरीक्षण और नुकसान का आकलन कौन करेगा? यदि समय पर सर्वे नहीं हुआ तो किसानों को सरकारी सहायता मिलने में परेशानी हो सकती है।
किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान की भरपाई आखिर कैसे होगी? खेती में पहले ही भारी लागत लग चुकी है। धान की फसल खराब होने से आगामी रबी फसल की तैयारी और परिवार की आर्थिक जरूरतों पर भी असर पड़ने की आशंका है।
किसानों की मांग – तत्काल सर्वे हो, मिले उचित मुआवजा
क्षेत्र के किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि बेमौसम बारिश और चक्रवात के प्रभाव से प्रभावित सभी गांवों में तत्काल फसल नुकसान का सर्वे कराया जाए। खेतों में भरे पानी की निकासी की व्यवस्था की जाए तथा बाहरा नाले के खराब गेट की मरम्मत प्राथमिकता से कराई जाए। साथ ही प्रभावित किसानों को नुकसान के अनुपात में उचित मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
किसानों का कहना है कि खेती पहले ही बाढ़ और बढ़ती लागत के कारण घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसे में कटाई के समय हुई इस बारिश ने उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है। अब किसानों की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ खराब हुई धान की फसल का नहीं, बल्कि उन परिवारों की आजीविका का भी है जिनकी सालभर की उम्मीद इसी फसल पर टिकी रहती है।
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